शंभू हॉस्टल केस: पटना पुलिस की जांच या 'चोर-पुलिस' का खेल? दो FSL रिपोर्टों ने खड़े किए संगीन सवाल

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पटना के शंभू गर्ल्स हॉस्टल केस में पुलिस जिस तरह जांच कर रही है, उससे बेहतर तो गांव में बच्चे चोर-पुलिस खेल लेते हैं. पहले दिन से पटना पुलिस इस घटना को लेकर केवल लापरवाह बनी ही नहीं रही, बल्कि इस मामले में अपनी बचकाना हरकत को वह समय समय पर साबित भी करती रही. चाहे एएसपी अभिनव कुमार हों या फिर सब इंस्पेक्टर रोशनी कुमारी. पटना पुलिस शायद अब भी शिल्पी गौतम रेप और हत्याकांड की जांच की राह पर ही चल रही है, तभी तो 20 साल बाद भी जांच की गंभीरता और उसका अंजाम सामने देखने को मिल रहा है. पटना पुलिस तो यह भी भूल गई कि गृह मंत्री सम्राट चौधरी के कार्यकाल का यह पहला सबसे बड़ा केस है और अगर इस केस में पटना पुलिस की लापरवाही उजागर होती है तो इसका ठीकरा सम्राट चौधरी के मत्थे ही जाएगा. भले ही उन्होंने पुलिस को जांच में फ्री हैंड देने की बात कही है.

दोषियों को माला नहीं पहनाएंगे, माला चढ़ाएंगे: सम्राट चौधरी

इस केस के बारे में सम्राट चौधरी साफ-साफ बोल चुके हैं कि जो दोषी है उसको माला पहनाने को नहीं कहेंगे, बल्कि माला चढ़ाने के लिए कहेंगे. उसको माला चढ़ाकर ही आओ. इसके साथ ही कुछ दिन पहले गृह मंत्री सम्राट चौधरी ने जांच रिपोर्ट की प्रगति जानने के लिए DGP, CID टीम, SIT के अलावा IG पटना और SSP पटना को तलब किया था.

नीलम अग्रवाल से पूछताछ से डर क्यों रही पटना पुलिस?

हालांकि मीडिया की नजर और मंत्री जी की सख्ती के बाद भी पटना पुलिस की एसआईटी ने अब तक नीलम अग्रवाल से पूछताछ करने की जहमत भी नहीं उठाई है, जो FIR होते ही प्रभात मेमोरियल हॉस्पिटल में परिजन से मिलने पहुंच गई थी. उससे पहले 6 जनवरी, 7 जनवरी और 8 जनवरी तीन दिनों तक वह परिजन से क्यों नहीं मिली थी, इसका जवाब पटना पुलिस के पास नहीं है. सवाल यही है कि आखिर पटना पुलिस नीलम अग्रवाल से डर क्यों रही है?

दो अलग-अलग FSL रिपोर्ट सामने, पुलिस के दावे पर सवाल

इस बीच इस केस में पटना पुलिस के पास अबतक दो अलग-अलग FSL रिपोर्ट सामने आई है. 13 जनवरी, 2026 को पटना पुलिस लिखती है कि प्रारंभिक जांच में घटनास्थल का निरीक्षण, एफएसएल टीम की जांच, हॉस्टल में लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज की जांच, हॉस्टल संचालक एवं वार्डन के बयान, डॉक्टरों तथा स्त्री रोग विशेषज्ञ के बयान एवं उपलब्ध जांच रिपोर्ट के आधार पर यौन उत्पीड़न की पुष्टि नहीं हुई है.

दूसरी ओर, 25 जनवरी, 2026 को पटना पुलिस लिखती है कि एफएसएल द्वारा किए गए परीक्षण के क्रम में कथित रूप से घटना के समय पहने गए एक अंतःवस्त्र से मानव शुक्राणु के अवशेष प्राप्त हुए हैं. एफएसएल द्वारा इसकी डीएनए प्रोफाइल तैयार की जा रही है. सवाल यही है कि अगर दूसरी रिपोर्ट सही है तो पहली रिपोर्ट अपने आप गलत हो जाती है?

लड़की के प्राइवेट पार्ट से निकल रहा था झाग

मीडिया रिपोर्ट में प्रभात मेमोरियल हॉस्पिटल के एक जूनियर नर्स का कहना है कि लड़की जब हॉस्पिटल में आई थी तो उसके प्राइवेट पार्ट से झाग निकल रहा था और कहा गया था कि लड़की पीरियड में थी, लेकिन वो पीरियड में नहीं थी. दूसरी ओर, SIT पर आरोप लग रहा है कि वह जहानाबाद जाकर परिवार पर लड़की के सुसाइड करने की बात कबूल करने का दवाब बना रही है. 

सब कुछ जहानाबाद में हुआ तो बेडशीट क्यों धुलवाया?

एक और चौंकाने वाली खबर एफएसएल टीम से आ रही है कि हॉस्टल की बेड की बेडसीट धुली हुई है. अब सवाल यह उठता है कि जब हॉस्टल में कुछ हुआ ही नहीं था और सब कुछ जहानाबाद में हुआ था तो बेडसीट को धोया क्यों गया? 

कुछ सवाल और उठते हैं: 

1- अगर मामला पारिवारिक था तो SSP कार्तिकेय कुमार शर्मा, SP परिचय कुमार, ASP कुमार अभिनव और SI रोशनी कुमारी ने शुरुआत में ही इस केस का डिटेल साफ-साफ क्यों नहीं बताया?

2- अगर मामला पारिवारिक था तो डॉ. सहजानंद, डॉ. सतीश, मेदांता और PMCH की रिपोर्ट में अंतर क्यों आ रहा है?

3- मामला पारिवारिक था तो बिल्डिंग मालिक, हॉस्टल मालकिन, हॉस्टल वॉर्डन और हॉस्टल के दूसरे बच्चे, अचानक सभी जगह से गायब क्यों हो गए? FIR के समय तक इन सब की हॉस्पिटल और हॉस्टल में मौजूदगी थी.

4- मामला पारिवारिक था तो इतनी माथा-पच्ची क्यों हुई? शुरुआती दिन ही प्रेस के सामने तथ्य रख देना चाहिए था?

5- मामला पारिवारिक था तो बिल्डिंग मालिक मनीष रंजन, हॉस्टल मालकिन नीलम अग्रवाल और वॉर्डन नीतू और चंचला 6 जनवरी को ही पुलिस को सबकुछ क्यों नहीं बताए?

6- मामला पारिवारिक था तो नीलम अग्रवाल FIR होते ही प्रभात मेमोरियल हॉस्पिटल में परिजन से मिलने क्यों गई? उससे पहले वह 6 जनवरी, 7 जनवरी और 8 जनवरी, तीन दिनों तक क्यों नहीं परिजन से मिली?


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