रांची: झारखंड उच्च न्यायालय ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. न्यायमूर्ति राजेश कुमार की अदालत ने साफ कर दिया है कि अगर बेटा और बहू अपने बुजुर्ग माता पिता को मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित करते हैं, तो उन्हें माता पिता की कमाई से बने घर में रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है.
1. 'वारिस होने का मतलब संपत्ति पर कब्जा नहीं'
अदालत ने संपत्ति के उत्तराधिकार पर बड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि उत्तराधिकार का अधिकार भविष्य से जुड़ा होता है. इसका मतलब यह कतई नहीं है कि बेटा बहू को संपत्ति पर तत्काल स्वामित्व मिल गया है. अगर मकान वरिष्ठ नागरिक की 'स्व अर्जित संपत्ति' (Self acquired property) है, तो उस पर उनका पूर्ण अधिकार है.
2. रामगढ़ के बुजुर्ग दंपति को मिला न्याय
यह मामला रामगढ़ के 75 वर्षीय लखन लाल पोद्दार और 72 वर्षीय उमा रानी पोद्दार का है. दंपति ने आरोप लगाया था कि उनका बेटा और बहू उनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं.
लंबी कानूनी लड़ाई: पहले एसडीएम (SDM) ने घर खाली करने का आदेश दिया था, लेकिन बाद में उपायुक्त (DC) ने इसे पलट दिया.
हाईकोर्ट का दखल: हाईकोर्ट ने उपायुक्त के आदेश को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि प्रशासन का दायित्व बुजुर्गों को 'गरिमापूर्ण जीवन' और 'सुरक्षा' प्रदान करना है.
3. सम्मान और शांति बुजुर्गों का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए जस्टिस राजेश कुमार ने कहा कि जीवन के अंतिम पड़ाव में मानसिक शांति मिलना हर वरिष्ठ नागरिक का अधिकार है. यदि परिवार के सदस्य ही उनके लिए परेशानी का कारण बन जाएं, तो न्यायालय उन्हें संरक्षण प्रदान करेगा.
