रांची: झारखंड में राज्य सूचना आयोग के पुनर्गठन की प्रक्रिया एक बार फिर विवादों में घिर गई है। राज्यपाल द्वारा सूचना आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी फाइल को आपत्तियों के साथ लौटाए जाने के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। मुख्य सचिव ने भी कुछ सवालों के साथ फाइल को कार्मिक विभाग को वापस भेज दिया है।
पूर्व सूचना आयुक्त एवं वरिष्ठ पत्रकार बैद्यनाथ मिश्र ने इस पूरे मामले पर सरकार और विपक्ष दोनों की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि राज्य सरकार और विपक्ष दोनों ही नहीं चाहते कि सूचना आयोग पूरी तरह सक्रिय हो। उन्होंने आरोप लगाया कि नेता प्रतिपक्ष से चर्चा के बावजूद ऐसे लोगों के नामों की अनुशंसा की गई जो नियमों के अनुरूप नहीं थे।
बैद्यनाथ मिश्र ने कहा कि महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति से पहले संबंधित व्यक्तियों का पुलिस सत्यापन कराना सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन क्या इस मामले में ऐसा हुआ, यह बड़ा सवाल है। उन्होंने आरोप लगाया कि कोर्ट के दबाव में केवल दिखावे के लिए नियुक्ति प्रक्रिया शुरू की गई।
उन्होंने यह भी पूछा कि सूचना आयुक्त पद के लिए कुल कितने आवेदन आए थे और किन आधारों पर अनुज कुमार सिन्हा, शिवपूजन पाठक, तनुज खत्री और अमूल नीरज खलखो के नाम चुने गए। मिश्र ने कहा कि राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को सूचना आयुक्त बनाए जाने पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। उनके अनुसार, भेजे गए नामों में अधिकांश व्यक्तियों का राजनीतिक जुड़ाव रहा है और कुछ पर आपराधिक मामले भी दर्ज हैं।
उन्होंने कहा कि यदि सरकार वही नाम दोबारा राज्यपाल को भेजती है तो फाइल फिर लौटाई जा सकती है। मिश्र ने यह भी स्पष्ट किया कि सूचना आयुक्तों की नियुक्ति कोई ऐसा विधेयक नहीं है जिसे राज्यपाल को अनिवार्य रूप से मंजूरी देनी पड़े।
इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। झामुमो प्रवक्ता मनोज पांडेय ने कहा कि नियुक्ति प्रक्रिया में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की सहमति शामिल थी और लोकभवन को इस मामले में सकारात्मक रुख अपनाना चाहिए।
कांग्रेस नेता प्रदीप बलमुचू ने कहा कि सरकार की मंशा गलत नहीं है। यदि योग्यता या अन्य कारणों से फाइल लौटी है तो कमियों को दूर कर दोबारा भेजा जाएगा।
वहीं भाजपा नेता दीनदयाल उपाध्याय ने दावा किया कि भाजपा ने योग्य नाम सुझाए थे, जबकि कांग्रेस और झामुमो ने विवादित व्यक्तियों के नाम आगे बढ़ाए। उन्होंने कहा कि अंतिम निर्णय सत्ता पक्ष के प्रभाव में ही लिया जाता है।