राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू आज (सोमवार, 29 दिसंबर) झारखंड के जमशेदपुर शहर के दौरे पर आने वाली हैं. राष्ट्रपति मुर्मू अपने इस दौरे पर 'ओल चिकी लिपि' के 100 वर्ष पूरे होने परसुडीह के करंडीह स्थित जहरास्थान में आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल होने वाली हैं. इससे पहले 25 दिसंबर को राष्ट्रपति मुर्मू ने 'ओल चिकी लिपि' में भारत का संविधान जारी किया था. राष्ट्रपति भवन में आयोजित इस कार्यक्रम में उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन और संसदीय कार्य राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल भी शामिल हुए थे. उपराष्ट्रपति ने इस पहल के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को धन्यवाद देते हुए कहा था कि इस महान पहल से संथाली बोलने वाले लोग अपनी भाषा में संविधान को पढ़ और समझ पाएंगे.
ओल चिकी लिपि का इतिहास
बता दें कि 'ओल चिकी' एक भारतीय लिपि है, जो संथाली भाषा लिखने में प्रयुक्त होती है. इसका आविष्कार पंडित रघुनाथ मुर्मू ने वर्ष 1925 में किया था. यह संथाली के लिए लेखन प्रणाली है, जो भारत में एक आधिकारिक क्षेत्रीय भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त है. यह लिपि बाएं से दाएं लिखी जाती है. यह भाषा मुख्यत: झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और बिहार के जनजातीय समुदायों द्वारा बोली जाती है. यह भाषा हो और मुंडारी भाषाओं से बहुत निकटता से संबद्ध है. संथाली भाषा ऑस्ट्रो-एशियाई भाषा-परिवार में मुंडा शाखा में आती है.
इतिहासकारों के मुताबिक, पंडित रघुनाथ मुर्मू ने आदिवासी समाज के लोगों के पढ़ने-लिखने के लिए इस लिपि का अविष्कार किया था. उन्होंने नदी के किनारे मिट्टी और रेत पर आकृतियां बनाकर इस लिपि का विकास किया, जिसे बाद में लकड़ी के सांचे में ढाला और 1925 तक एक पूर्ण लिपि तैयार कर ली. कहते हैं कि इस लिपि के आने के बाद संथाली संस्कृति और साहित्य को बढ़ावा मिला. आज यह लिपि संथाली भाषा बोलने वालों को गौरवान्वित महसूस कराती है. आदिवासी समाज के लोग भी अब अपनी मातृभाषा में संविधान और अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेजों को समझ पाते हैं.
